फ्रीडम फाइटर धनेश्वर प्रसाद महतो इतिहास के पन्नों में हो रहे हैं जमीनदोज

प्रखंड मुख्यालय के सिलालेख पर नाम दर्ज कराने के लिए संघर्षरत हैं परिजन

ब्रजेश भारती : सिमरी बख्तियारपुर – भारत के इतिहास में सैकड़ों फ्रीडम फाइटर रहे हैं जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की चूले हिला दी। उन्हीं में से एक थे सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर निवासी गुरुजी के नाम से चर्चित बाबू धनेश्वर प्रसाद महतो। सिमरी बख्तियारपुर के इतिहास के पन्नों में स्वतंत्रता सेनानी धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। लेकिन इस बात की हमको व हमारी नई पीढ़ी को कोई परवाह है और न ही समझ।

स्वतंत्रता सेनानी धनेश्वर बाबू का स्मारक

यहां तक की सरकार भी इन कोहिनूरों को सहेजने में सफल नहीं हो पा रही है। ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जिनके नाम पर आज कोई संग्रहालय या फिर सेनानी द्वार नहीं बनाया गया है। यहां तक कि पुण्यतिथि भी नहीं मनाई जाती है। परिजनों ने अपने खुद के पैसे से इस स्वतंत्रता सेनानी का समाधि स्थल बनाने का कार्य किया है।

यहां तक की सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड परिसर के बाहर लगे स्वतंत्रता सेनानी के नाम के शिलापट्ट पर भी इनका नाम उकेरा हुआ नहीं है। परिजन इस सिलालेख पर नाम दर्ज कराने के लिए संघर्षरत है। अभी आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है दरकार है ऐसे स्वतंत्रता सेनानी को उनका उचित सम्मान दी जाए ताकि आगे की पीढी ऐसे स्वतंत्रता संग्राम के रणबांकुरों याद कर सकें।

जन्म : इलाके के प्रसिद्ध शिक्षाविद स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय धनेश्वर प्रसाद महतो का जन्म सिमरी बख्तियारपुर नगर परिषद के आजाद नगर गंज के टोले में 1 नवंबर 1911 में साधारण कुशवाहा किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम स्व. प्रभु महतो एक किसान थे।

धनेश्वर बाबू, फाइल फोटो

शिक्षा : धनेश्वर बाबू का शिक्षण कार्य अनुमंडल के सलखुआ प्रखंड में अपर प्राइमरी विद्यालय से शुरू हुआ था। तत्पश्चात 1925 में सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के मध्य विद्यालय सरड़ीहा से मिडिल बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण किए। 1932 में शिक्षण प्रशिक्षण विद्यालय खगरिया में उन्होंने प्रशिक्षण की डिग्री प्राप्त की। 1941 ईस्वी में प्रयाग विश्वविद्यालय से यह प्रथमा की डिग्री प्राप्त की। वही 2 जनवरी 1931 ईस्वी को अपर प्राइमरी विद्यालय मखाना बाजार में अध्यापन का आरंभ किया।

स्वतंत्रता आंदोलन : धनेश्वर बाबू का आजाद नगर गंज स्थित आवास स्वतंत्रता आंदोलन के समय कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अड्डा रहता था। जिसके कारण गोरी सरकार की निग़ाहों में रहतीं थीं। जिस समय महात्मा गांधी ने करो या मरो का नारा एवं भारत छोड़ो का आंदोलन शुरू किया था। उस समय सच्चे अनुयाई होने के नाते धनेश्वर बाबू ने अपने स्वतंत्रता संग्राम के उत्साही साथियों के साथ आंदोलन के कार्य में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।

रेल की पटरियों को उखाड़ने, रेलवे स्टेशन जलाने, पोस्ट ऑफिस को लूटने, थाना के कागजातों को अग्नि में समर्पित करने आदि के जुर्म में इन्हें 27 नवंबर 1942 को गिरफ्तार कर मुंगेर मंडल कारा में डाल दिया गया। इधर गोरी पलटन ने उनके घर में धावा बोलकर दर्जनों मवेशियों को स्थानीय अगरतला फाटक में बंद करवा दिया एवं गोरी पुलिस ने घर की संपत्ति को लूटने का काम किया।

फलत: घर के सभी छोटे-बड़े सदस्य अपने घर को छोड़कर महीनों भूमिगत रहे। लगभग 9 महीने तक इन्होंने जेल की कठिन यातनाओं को सहने एवं परिवार के सदस्यों को भी भारी आर्थिक एवं शारीरिक कष्ट भुगतना पड़ा। 18 जून 1943 को मुकदमे में रिहाई के पश्चात कारा मुक्त होकर घर वापस आए।

जेल में : जेल की जीवन में भूतपूर्व सांसद स्व. जियालाल मंडल, स्थानीय कांग्रेस के संस्थापक रामशरण प्रसाद, मुंगेर के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निरापद मुखर्जी एवं नंदकुमार सिंह के साथ साथ डॉ रामजी प्रसाद, स्वर्गीय जनार्दन सिंह मथुरा प्रसाद सिंह, स्वर्गीय राम प्रसाद सिंह, श्री बाल कृष्ण वर्मा अयोध्या मंडल आदि का साहचर्य प्राप्त हुआ।

समाजसेवा : धनेश्वर बाबू 1934 में विनाशकारी भूकंप के समय डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, श्री कृष्ण सिंह आदि बिहारी नेताओं के साथ मुंगेर में भूकंप पीड़ितों की सेवा में हाथ बंटा कर उन्होंने अपनी सेवा भावना का परिचय दिया। कोसी बांध के निर्माण के समय छात्रों के साथ श्रमदान में लगने सहित अन्य सामाजिक कार्य को उन्होंने अंजाम दिया।

स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भारत सरकार ने इन्हें प्रशस्ति ताम्र पत्र के साथ 15 अगस्त 1972 से पेंशन एवं अन्य सुविधाओं से सम्मानित किया गया। जिसका लाभ उन्हें आजीवन मिलता रहा। जनमानस में शिक्षा का ज्योति जगाने के लिए इन्हें गुरु जी जैसे कर्ण प्रिय शब्द से आम आवाम ने नवाजा।

परिजन बना रहे, हैं समाधि स्थल : स्वर्गीय धनेश्वर बाबू के परिजन कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधि को समाधि स्थल या फिर कोई प्रतीक चिन्ह या फिर आदम कद प्रतिमा इनके नाम पर तोरण द्वार बनाने की मांग कर चुके हैं। लेकिन अब तक इस दिशा में पहल नहीं की गई है। मजबूर होकर धनेश्वर बाबू के परिजन ने अपनी राशि खर्च कर समाधि स्थल बनाया जा रहा है। परिजनों ने बताया कि स्वर्गीय धनेश्वर बाबू की मृत्यु 4 मई 1994 को पैतृक आवास पर हुई थी। उस समय उनका अंतिम संस्कार सरकारी प्रोटोकॉल के अनुसार हुआ था।